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ncfc के जन-जागरूकता कार्यक्रम
(पशु पालको तथा डेयरी मालिको हेतू)
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ncfc अपने जन जागरूकता कार्यक्रमों को इस प्रकार संचालित करती हैं की पशु पालको तथा डेयरी मालिको में पशुपालन तथा व्यवसायिक आधार पर दुग्ध उत्पादन हेतू जागरूकता पैदा की जा सके क्योकि ncfc का उद्देश्य दुग्ध व्यवसाय को उद्योग के रूप में स्थापित करवाना हैं |
ncfc इस हेतू -
(1) स्वयं सेवी संस्थाओ / NGO's आदि के माध्यम से गाँव-गाँव में मनोरंजक कार्यक्रमों के माध्यम से पशु पालको को पशुपालन, पशुस्वास्त्य तथा पशु आहार से सम्बंधित जानकारियाँ देती हैं, तथा
(2) पशु चिकित्सकों / पशु चिकित्सा साध्य्को के माध्यम से पशुओं को कैसे स्वस्थ रखा जाये उन्हें समय-समय पर क्या-क्या आहार/विहार दिया जाये आदि की जानकारियाँ तथा बीमारी से बचने हेतू पशुओं की Pre-caution की जानकारियाँ देती हैं|
इन कार्यक्रमओ का उद्देश्य पशुपालको में पशुपालन तथा व्यवसायिक रूप से दुग्ध उत्पादन के प्रति जागरूक करने के साथ ही साथ अपने उत्पादों का प्रचार-प्रसार करना भी होता हैं|
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ncfc की पशु पालको तथा दुग्ध उपभोक्ताओ में जागरूकता Awareness संबंधी नीति :-
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यह कार्य संस्थान का ncfc डेयरी केटल केयर अवेयेरनेस प्रोग्राम (Dairy Cattle Care Awareness Program) के अंतर्गत निम्न स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाता है -
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पशुपालको हेतु :-
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ncfc स्वयं अपने माध्यम से तथा स्वयं-सेवी संस्थाओ के माध्यम से "दुधारू पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता में वृद्धि कर अधिक लाभ कैसे प्राप्त करे", के लिए गाँव-गाँव जाकर पशुपालको / डेयरी उद्यमियों को पशुओं का पालन-पोषण तथा स्वास्थ्य तथा आहार-विहार संबंधी जानकारी देते है तथा हानिकारक रसायनों के प्रयोग से जानवरों तथा दुग्ध उपभोक्ताओ को होने वाले दुष्परिणामों से अवगत करवा कर प्राकृतिक रूप के तैयार पशु आहार के प्रति जागरूकता पैदा करती है |
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उपभोक्ताओ हेतु :-
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ncfc स्वयं तथा स्वयं-सेवी संस्थाओ के माध्यम से पशुओं को खिलाये जाने वाले रासायनिक पशु आहारों तथा दूध दुधने के पूर्व लगाये जाने वाले रासायनिक इंजेक्शनों के दुष्परिणामों से उपभोक्ताओ को जागरूक किया जा रहा है |
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ncfc का दुधारू पशुओ की देखभाल संबंधी जागरूकता कार्यक्रम (ncfc's Dairy Cattle Care Awareness Program):-
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इस कार्यक्रम का उद्देश्य दुधारू पशुओं की देखभाल तथा पालन पोषण आदि कैसे की जानी चाहिए, इसकी व्यवहारिक जानकारी देनी है | इस हेतु ncfc ग्रामीण अंचलों में प्रशिक्षण शिविर लगाकर तथा संस्थान की "मॉडल डेयरियों" के माध्यम से पशु पालकों का मार्गदर्शन करना है |
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दूध के गुण :-
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दूध एक प्राकृतिक सम्पूर्ण आहार है जिसमें मानव के उपयोग के सभी पोषक तत्व मौजूद होते है प्राकृतिक रूप से दूध माता से नवजात शिशु को प्राप्त होता है दूध प्रवाह के समय वसा एवं पानी से मिश्रित लगभग 40 रासायनिक यौगिकों से युक्त रहता है |
स्वस्थ पशु एवं रोगी पशु की पहचान :-
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क्र0
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स्वस्थ पशु
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क्र0
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रोगी पशु
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1
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स्वस्थ पशु कि आंखे हमेशा चमकीली और तेज होती है तथा उसके नथुने पर पानी के मोती होते है |
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1
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आँखों की चमक क्षीण हो जाती है नथुने व मुँह सूखा रहता है | तथा उसकी चमक भी तेज नहीं रहती है |
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2
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कानों व पूँछ को स्वभाविक रूप से हिलाता डुलाता रहता है और हर समय चौकन्ना व चुस्त दिखाई देता है |
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2
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कानों व पूँछ को स्वभाविक रूप से हिलाना बंद कर देता है | कभी कभार ही विवश होकर पूँछ हिलाता है शरीर दुर्बल क्षीण व सुस्त होता है |
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3
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दिन भर में कम से कम 5-6 बार मल मूत्र त्यागता है |
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3
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मल मूत्र त्यागना स्वभाविक ढंग से नहीं करता | बहुत कम करता है अथवा बहुत अधिक एवं बार-बार करता है |
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4 |
स्वस्थ पशु के कान खड़े व बालों के रोयें तथा त्वचा में हर समय चमक सी रहती है |
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4 |
कान प्रायः नीचे लटक जाते है, बाल व रोयें खड़े-खड़े रहते है तथा उनकी चमक कम हो जाती है |
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5 |
स्वस्थ पशु शरीर के किसी भाग को छूने या मक्खी या किसी पक्षी के बैठते ही शरीर का सिकोड़ने व थरथराने लगता है अथवा पूंछ द्वारा उड़ा देता है |
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5 |
थरथराहट नहीं होती है यहाँ तक की पक्षियों द्वारा चौंच मारने पर भी चुपचाप पड़े रहते है तथा पूंछ भी सामान्यतः नहीं हिलाते |
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6 |
कुछ रोगी पशु की आंख से कीचड़ मुँह से झाग या लार अधिक गिरती है |
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7 |
पशु का जोर से हाँफना, एक ही स्थान पर चक्कर लगाना, घबराहट होना, बैचेनी, जीभ बार-बार बाहर निकलना |
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दुग्ध उत्पादन हेतु गायों की संतुलित आहार तालिका :-
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क्र0
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पोषण पद्दति दूध उत्पादन हेतु आहार
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5 लीटर प्रतिदिन दूध उत्पादन हेतु आहार
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10 लीटर प्रतिदिन दूध उत्पादन हेतु आहार
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15 लीटर प्रतिदिन दूध उत्पादन हेतु आहार
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1
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सूखा चारा जैसे धान का पुआल गेंहू का भूसा आदि
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भूसा सूखा चारा 6 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 2 कि0 ग्रा0
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सूखा भूसा चारा 7 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार 4 कि0 ग्रा0 मिश्रण
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भूसा सूखा चारा 7.5 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 6 कि0 ग्रा0
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2
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हरा चारा जैसे मक्का, ज्वार, पैराघास, देशी घास
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हरा चारा 25 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 2 कि0 ग्रा0
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हरा चारा 25 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 4 कि0 ग्रा0
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हरा चारा 25 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 6 कि0 ग्रा0
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3
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बरसीम, लुसर्न लोबिया
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बरसीम-लोबिया लुसर्न 10 कि0 ग्रा0 भूसा 5.5 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 1.8 कि0 ग्रा0
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बरसीम-लोबिया लुसर्न 10 कि0 ग्रा0 भूसा 5.5 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 4 कि0 ग्रा0
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बरसीम-लोबिया लुसर्न 10 कि0 ग्रा0 भूसा 5.5 कि0 ग्रा0 नर्मदा पशु आहार मिश्रण 6 कि0 ग्रा0
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नोट :-
1. उक्त मात्रा में नर्मदा पशु आहार या नर्मदा सप्लीमेंट्री केटल फीड की मात्रा आधी ही जायेगी |
2. नर्मदा मिल्क बूस्टर प्रतिदिन 100 ग्राम सुबह 100 ग्राम देना अनिवार्य होगा इससे 15 प्रतिशत दुग्ध वृद्धि तथा रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रासायनिक इंजेक्शनों से छुटकारा दिया जा सकता है |
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समय सारणी :-
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अधिक दूध उत्पादन हेतु संतुलित आहार के साथ-साथ एक सफल दुग्ध व्यवसाय के लिए एक निश्चित एवं नियमित समय सारणी का होना आवश्यक है | जो निम्नवत हो :-
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समय प्रातः काल
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दुग्ध
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| 5 से 6 बजे तक
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दुग्ध दुहना
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| 6 से 6.30 बजे तक
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पशु शाला एवं नादो कि सफाई
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| 6.30 से 7.30 बजे तक
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चारा नर्मदा पशु आहार खिलाना
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| 7.30 से 8 बजे तक
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पानी पिलाना
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| 8 से 9 बजे तक
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पशुओं को नहलाना
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| 9 से दोपहर 3 बजे तक
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पशु को हरा चारा देना, घूमने फिरने देना
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| सायं काल
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कार्य
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| 3 से 3.30 बजे तक
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पशु शाला की सफाई एवं पशुओं को बाँधना
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| 3.30 से 4.30 बजे तक
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दुग्ध दुहना
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| 4.30 से 5.30 बजे तक
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चारा नर्मदा पशु आहार खिलाना
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| 6.30 से प्रातः 5 बजे तक
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पशुओं को आराम करने देना चाहिए
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नोट :-
नर्मदा पशु आहार या नर्मदा सप्लीमेंट्री केटल फीड दोनों में से एक खिलाना चाहिये | फर्क इतना है कि नर्मदा पशु आहार का आधा नर्मदा सप्लीमेंट्री केटल फीड खिलाना चाहिये |
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गर्भवती गाय / भैंस कि देखभाल :-
गर्भावस्था में गाय / भैंस की उचित देखभाल करना अत्यन्त आवश्यक है | गाय / भैंस के ग्याभन होने पश्चात पशुपालक विभिन्न लक्षणों के आधार पर गर्भ धारण का अनुमान लगा लेते है | परन्तु यदि संभव हो तो गाय / भैंस के ग्याभन होने के तीन माह पश्चात गाय / भैंस की जाँच करवा लेना चाहिये ताकि उचित देखभाल करने में आसानी हो |
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गर्भावस्था में क्या करें :-
1. गाय / भैंस के लिए एकांत स्थान की व्यवस्था करें, विशेष रूप से जब सॉतवा माह आरंभ हो जावे |
2. घास, चारा अथवा भूसे के विछापन की व्यवस्था करें |
3. संतुलित पशु आहार - चारा, घास भूसे की सानी एवं साफ पानी पीने को दें, संतुलित आहार सॉतवे माह से डेढ़ से ढाई किलो प्रति दिन बढ़ा बना चाहिए |
4. प्रसव होने तक पशु को दौड़ाना अथवा मारना अत्यन्त हानिकारक होता है, इससे गर्भपात होने की आशंका रहती है | अतः इस बारे में अत्यन्त सावधानी बरतें |
5. गाय / भैंस को चराने अधिक दूर ने भेजें | ( लेकिन ग्याभन गाय / भैंस को थोड़ा घूमना करना चाहिए ) |
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प्रसव के पश्चात् गाय / भैंस की देखभाल :-
1. यदि प्रसव के पश्चात् २४ घंटे के भीतर 'जेर' न गिरे तो पशु चिकित्सक की सहायता लेनी चाहिए |
2. प्रसव के बाद गाय / भैंस को उबला पानी ठंडाकर दो-तीन दिन तक देना ठीक रहता है |
3. प्रसव के तत्काल बाद उबले गेंहू के दलिये में गुड़, सोंठ और अजवायन अदि मिलाकर दें | इस समय डेढ़ किलो दलिया में आधा किलो गुड़ 250 ग्राम तेल व इतनी ही मेथी मिलाकर देना अत्यन्त लाभदायक है | प्रसव के पश्चात शीघ्र ही पचने वाला केवल पौष्टिक आहार देना चाहिए | यदि पाड़ा बच्चा हो तो मठा अवश्य पिलाये | ताकि पटार अदि से बचाव हो सके |
4. महुआ, सरसों का तेल व मैथी आदि भी काफी लाभप्रद होते है |
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अधिक दूध देने वाले पशुओं में होने वाली महत्वपूर्ण बीमारी :-
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दुग्ध ज्वर (Milk fever):-
अधिक दूध देने की क्षमता देने वाली गाय, भैंस में ब्याने के बाद एक से तीन दिन में लक्षण प्रकट होते हैं जानने के बाद जो चीका निकाला जाता है उसमे कैल्शियम की मात्रा बहुत अधिक होती है | यह कैल्शियम शरीर से ही ऐन में आते है, अतः रक्त में कैल्शियम एकदम घट जाता है |
लक्षण:- दुधारू पशु की भूख मर जाती है उसे कब्ज और बैचनी रहती है | दुग्ध ज्वर नाम होते हुए भी शरीर का तापमान नहीं बढ़ने से पशु को बुखार नहीं होता | कभी-कभी गर्दन की पेशियों में अकड़न, ऐठन आकर, कमजोरी आने से घूमने फिरने में तकलीफ होती है | चलने में लड़खडाता है | गाय, भैंस सिर नीचे लटकाकर सुस्त खड़ी हो जाती है | ऐसा लगता है कि गाय गहरी नींद में खड़ी हो, वह धीरे-धीरे गहरी साँस लेती है |चारा पशु आहार नहीं नीडल सकती, मुँह आधा खुला रहता है, जीभ बाहर लटक पड़ती है | शीघ्र चिकित्सा के आभाव में गाय / भैंस की मृत्यु हो सकती है |
चिकित्सा:- इसका एक मात्र इलाज गाय, भैंस को पशु चिकित्सक कि सलाह से कैल्शियम ग्लूकोनेट का इंजेक्शन दें | तथा बाद में अच्छी कंपनी का मिनिरल मिक्चर ( नर्मदा केटल मिनिरल मिक्चर ) प्रतिदिन 30 से 50 ग्राम दाने में मिलाकर दिया जाना चाहिए | वैसे नर्मदा पशु आहार / नर्मदा सप्लिमेंटरी केटल फीड में मिनिरल मिक्चर होता है | यह चिकित्सक के कहने पर ही देना चाहिए |
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विदेशी / संकर पशुओं में होने वाले विशिष्ट संक्रामक रोग -
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थीलेरियासिस (Theilariasis) :-
विदेशी नस्ल के तथा जिन पशुओं में विदेशी संकर अंश अधिक है उनमें गिचौडी (Ticks) ke माध्यम से फैलते है | पशु के शरीर में गिचोड़ियों के काटने से प्रोटोजोआ परजीवी फैलता है तथा रक्त कि लाल कोशिका पर आक्रमण करता है |
लक्षण:- पशु में तेज बुखार होता है, भूख मर जाती है, एनीमिया एवं पीलिया कि लक्षण पैदा होते है | पशु कि तिल्ली (pleen) लीवर तथा लसिका ग्रंथिया सूज जाती है | मुँह मसूड़ें तथा आंतो में सूजन आकर फूल जाते है | पेचिस भी हो सकती है | इस रोग का कोई स्पष्ट प्लान इलाज नहीं है | पशु अधिकांशतः मर जाते है | बीमार पशु के खून की जाँच से ही सही निदान सम्भव है | पशु चिकित्सक की सलाह से सहायक चिकित्सा कुछ लाभकारी हो सकती है |
एनाल्पास्मोसिस (Anaplasmosis) :-
मक्खी, मच्छर तथा गिचौडी ( एक विशेष प्रकार का परजीवी ) के माध्यम से विदेशी आयात किये पशुओं में होता है | पशुओं की भूख कम होकर पशु सुस्त हो जाता है | बहुत तेज ज्वर आता है, श्वांश में तकलीफ | तथा पीलिया होकर एकदम शरीर में कमजोरी होती है | गाभिन पशु गर्भ फेंक देते है | कम उम्र के पशुओं में अधिकतर होता है | अधिकांश पशु की म्रत्यु हो जाती है | इस बीमारी का कोई स्पष्ट इलाज नहीं है | पशु चिकित्सक की सलाह से सहायक चिकित्सा लाभकारी होगी |
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दुग्ध उत्पादन हेतु नर्मदा पशु आहार के अतिरिक्त प्राकृतिक संतुलित आहार :-
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| क्र0
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फसल चक्र
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बोने का समय
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चारा उपलब्धता
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1 |
पैराघास + गिनीघास
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मार्च- जुलाई |
पूरे वर्ष
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2 |
मक्का + लीबिया |
जून- जुलाई |
सितम्बर-अक्टूबर
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बरसीम + जई
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अक्टूबर-नवम्बर |
दिसम्बर-मार्च
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लीबिया + मक्का
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फरवरी-मार्च |
अप्रैल-जून
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3 |
मक्का + लीबिया |
अप्रैल |
जून- जुलाई |
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सामान्य घास |
जून- जुलाई |
अक्टूबर-नवम्बर |
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बरसीम + जई |
अक्टूबर-नवम्बर |
जनवरी-मार्च |
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4 |
मक्का + लीबिया |
अक्टूबर-नवम्बर |
सितम्बर-अक्टूबर |
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बरसीम +नेपियर घास |
अक्टूबर-नवम्बर |
जनवरी-अप्रैल |
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साइलेज |
मार्च-अप्रैल |
अप्रैल-जून |
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हरा घास |
जुलाई-अगस्त |
अगस्त-सितम्बर |
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नोट :- 1. उक्त सभी घास/ चारा सभी विटामिनों से भरपूर है |
2. स्थानीय भाषा में उपरोक्त हरा चारा के नाम बदल जाते है | लेकिन चारा वही होता है नर्मदा पशु आहार मिश्रण के अलावा संतुलित आहार हेतु हरे चारे की पौष्टिकता का अलग महत्त्व है अतः हमें हरे चारे की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए|
3. सभी जानकारियाँ दुधारू पशुओं की केयर टेकिंग सम्बंधित माप दंडों के आधार पर है | लेकिन पूरे देश में जानवरों के स्वास्थ्य एवं दूध देने आदि का आम समय काल परिस्थिति एवं उचित वातावरण एवं पालन पोषण की पद्धति / तौर तरीके का प्रभाव पशुओं पर पड़ता है |
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